गीत
मन
मन रूठा, मनाऊँ कैसे?
सुरज का उगना, फूलों का खिलना,
नदिया का बहना, झरने का झरना,
संझा को धरती का सूरज से मिलना,
मौसम बदलना
दिखते हैं केवल
कैलेंडर के पन्नों पर महीने बदलते,
टिक-टिक टिक-टिक सुइयाँ सरकते,
सौंधे से, भीने से, रिश्ते दरकते,
मन रूठा, मनाऊँ कैसे?
बचपन की गलियों में कुछ पल बिताकर,
नानी के किस्सों में, निंदिया चुराकर
आमों के, बेरों के, जंगल में छुपकर,
बहलाकर-फुसलाकर नन्हें से मन को
लौट आना पड़ता है फिर
कारों की लंबी कतारों की दुनिया में,
रोटी की मारामारी की दुनिया में,
झूठे- मक्कारों, बेकारों की दुनिया में
12.7.2011



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