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पुल





उस पीढ़ी से इस पीढ़ी तक

कई पुल बनने हैं।

कुछ कदम तुम चलो,

कुछ मैं।

 

याद रखना,

बनाओ जब  पुल तो

इनमें सरकारी सीमेंट न हो,

दीवारों में सेंध न हो।

 

बनाना तुम, लोहे की नींव

लगाना तुम, प्यार की सीमेंट

विश्वास की थापी से।

 

फिर देखना, आहिस्ता-आहिस्ता

बनेगा जो पुल ,

उसी पर से देखेंगे हम

 उगते सूरज को साथ-साथ।


आज इन्हीं छोटे- छोटे पुलों की आवश्यकता है। भाषाओं के बीच , व्यक्तियों को बीच, समाजों के बीच,देशों के बीच..। रिश्ते -नाते , परिजन, पड़ोसी, यूक्रेन, रूस, सीरिया,इज़रायल, अफ्रीका... सभी के बीच पुल निर्मित हों।


'सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे संतु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित दुःख भाग्भवेत्।।'

सार्वभौमिक सुख, नीरोग, कल्याण हो और कोई दुख का भागी न हो ,


भगवान से की गई यह प्रार्थना तभी फलीभूत हो सकती है।



 
 
 

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