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केल्या शिवाय होत नाहीं

कुछ तो लिखना है । चलिए, लिखती हूँ कुछ-


एक बड़ा घर है । बहुत सारे लोग रहते हैं । अपनी- अपनी पसंद के काम करते हैं । किसी को कोई रोकटोक नहीं है । सबकी अपनी -अपनी सोच है। ये लोग  हँसते भी हैं। लेकिन अपने मोबाइल की बातों पर। वाद - संवाद नहीं है । जब भी संवाद स्थापित करने की कोशिश की है वाद , विवाद बन जाता है । तो वाद - विवाद से बचने के लिए संवादहीनता है। सहज प्रश्न और सहज सलाह, सहज टिप्पणी करने के पूर्व सोचना पड़ता है कि पॉलीटिकली करैक्ट अर्थात् कूटनीति से कैसे बोला जाए। 


आपस में  सदस्यों से फोन और ईमेल पर बात होती है । आमने-सामने नहीं! कुछ बातें होती भी हैं, लेकिन एक गहरा खालीपन-खोखलापन! 


कुंठाएँ, आशंकाएँ, कुतर्क बुद्धि कुचाल! कितने ‘कु’ प्रवेश कर चुके हैं । यही है वर्तमान समाज का स्वरूप ! 


ऊपरी लिपाई-पुताई बहुत शानदार, उत्कृष्ट है । भीतर  अंतहीन सूनापन ! कुछ बिखरा  जा रहा है,  ऐसा न समझिए कि लेखिका निराशावादी है ! नहीं ! कदापि नहीं । जो बिखर रहा है , उसे समेटने की कोशिश है । आइए हम सब मिलकर समेटते हैं । ज़िंदगी की अनबूझ पहेली या जिग्सॉ पज़ल, को सुलझाते हैं । कहीं न कहीं गलती हो गई हैं । गाँठें रह गईं हैं । इन गाँठों को खोलना होगा । हमें समाज को स्वस्थ और बेहतर बनाना है। मराठी में कहते हैं 'केल्या शिवाय होत नाहीं', हिंदी में 'अपने मरे ही स्वर्ग दिखता है' मेरा लेखन समाज के लिए है। आपके लिए है । तो आईए, अपनी अपनी भूमिका में अपना-अपना धर्म निभाएँ ।

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